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कांग्रेस के सुरक्षा कवच अहमद पटेल को खोने के पार्टी के लिए क्या हैं मायने?

दिग्गज रणनीतिकार अहमद पटेल के निधन से उनके पार्टी सहयोगी सकते में हैं. अभी अहमद पटेल पार्टी के कोषाध्यक्ष थे लेकिन उनका पार्टी में कद इससे कहीं बड़ा माना जाता रहा है. कांग्रेस पार्टी के दर्जनों टॉप नेताओं के सियासी सफर में कहीं ना कहीं अहमद पटेल का अहम रोल रहा.

भरत चुडासमा – अहमद पटेल के दुनिया से रुखसत होने के भारतीय राजनीति, खास तौर पर कांग्रेस के लिए क्या मायने हैं? आखिर क्यों उन्हें पिछले कुछ दशकों से ‘द ग्रैंड ओल्ड पार्टी’ की रीढ़ माना जाता रहा? अहमद पटेल का पार्टी के लिए क्राइसिस मैनेजमेंट हाल में उस वक्त दिखा, जब उन्होंने सचिन पायलट को पार्टी में बने रहने के लिए ही मना लिया, या पार्टी के अंसतुष्ट जी-23 नेताओं के ‘लेटर बम’ को डिफ्यूज करने में उन्होंने जो भूमिका निभाई.

बुधवार सुबह दिग्गज रणनीतिकार अहमद पटेल के निधन से उनके पार्टी सहयोगी सकते में हैं. अभी अहमद पटेल पार्टी के कोषाध्यक्ष थे लेकिन उनका पार्टी में कद इससे कहीं बड़ा माना जाता रहा है. कांग्रेस पार्टी के दर्जनों टॉप नेताओं के सियासी सफर में कहीं ना कहीं अहमद पटेल का अहम रोल रहा.

अहमद भाई या एपी के नाम से जाने जाने वाले अहमद पटेल ने गांधी परिवार की तीन पीढ़ियों के साथ काम किया. राजनीतिक करियर की शुरुआत में इंदिरा गांधी ने उनके हुनर को पहचाना और उनको लोकसभा के सियासी रण में उतारा. अपनी उपयोगिता और राजनीतिक कौशल की वजह से अहमद पटेल पार्टी में सीढ़ी दर सीढ़ी चढ़ते रहे.

खुद लाइमलाइट से दूर रहना पसंद करने वाले अहमद पटेल, मीडिया में क्या छप रहा है उस पर पैनी नजर रखते थे. एक किस्सा मशहूर है कि कैसे अहमद पटेल ने एक पत्रकार का 6 महीने तक फोन नहीं उठाया. जब वह किसी बैठक के बाद उस पत्रकार से मिले तो अहमद पटेल ने याद दिलाया कि कैसे पत्रकार ने अपनी रिपोर्ट में उनको गलत ढंग से कोट किया था. अहमद पटेल ज़्यादा बोलना पसंद नहीं करते थे लेकिन अपनी बात से पलटते भी नहीं थे. पार्टी में क्या चल रहा है उनसे बेहतर कोई नहीं जानता था, क्योंकि वही पार्टी के सूत्रधार हुआ करते थे.

सोनिया गांधी के सुरक्षा कवच 
केंद्र में यूपीए के शासन के दौरान पार्टी और सरकार के दो पावर सेंटर को लेकर मीडिया में बहुत चर्चा रहती थी. नेशनल एडवाइजरी काउंसिल के सुझाव और केंद्र सरकार की योजना के बीच में समन्वय और तालमेल बैठाने में अहमद पटेल की अहम भूमिका रही. अहमद पटेल ‘10 जनपथ’ का सुरक्षा कवच थे. यूपीए सरकार की गलतियों का ठीकरा कांग्रेस हाईकमान पर ना फूटे इसके लिए अहमद पटेल की कोशिश हमेशा हमलों को डिफ्लेक्ट करने की रहती.

2009 में यूपीए-2 के तौर पर कांग्रेस की सत्ता में वापसी में सोनिया गांधी के सारथी के रूप में अहमद पटेल ने अहम योगदान दिया. लेकिन पटेल का स्टाइल था कि ना तो वह कभी कैमरे पर आते थे और ना ही तस्वीरों में नज़र आते. लेकिन बैकरूम मैनेजमेंट में उनका कोई सानी नहीं था. सब कुछ करते हुए भी उन्होंने क्रेडिट की चाह नहीं रखी. ऐसे दौर में जब नेता खुद की ब्रैंडिंग और कसीदे मीडिया में देखना पसंद करते थे, अहमद पटेल के कुछ गोल्डन रूल रहे. वह अपना नाम सुर्खियों में देखना पसंद नहीं करते थे. उनके हवाले वाली खबरें अक्सर उनके नाम के बिना पार्टी के टॉप सूत्रों से मिली जानकारी के नाम से छपती थीं.

सादगी की मिसाल 
यह भी सच है कि अहमद पटेल ने अपना अंदाज कभी नहीं बदला, चाहे वह मुश्किल के दिन हों या अच्छे दिन. उनकी सादगी की मिसाल इससे बड़ी क्या हो सकती है कि इतना पावरफुल शख्स होने के बावजूद उनके नाम की प्लेट उनके घर के बाहर कभी नजर नहीं आई. वो 24X7 स्टाइल वाले राजनेता थे. उनका दिन दोपहर के 12 बजे से शुरू होता और रात के तीन बजे तक वह सियासत की उधेड़बुनें सुलझाने में लगे रहते.

उनसे बात करने का सबसे आसान तरीका उनके घर का लैंडलाइन नंबर रहता था. पत्रकार यह बात जानते थे कि अगर अहमद पटेल के लिए आपने उनके लैंडलाइन नंबर पर कोई मैसेज छोड़ा तो वह आपको कॉल बैक जरूर करेंगे. नेता हो, पत्रकार हो या फिर पार्टी कार्यकर्ता अहमद पटेल हर एक से निजी बॉन्डिंग रखते थे. उनकी याददाश्त इतनी तेज थी कि कोई उनसे लंबे अर्से के बाद भी मिलने जाए तो वे हमेशा परिवार के बाकी सदस्यों की खैरियत के बारे में पूछते.

हाशिए पर भी रहे मिस्टर कूल 
एक वक्त था जब पार्टी में अहमद पटेल की तूती बोलती थी लेकिन जब वक्त बदला और राहुल गांधी सेंट्रल स्टेज पर आए तो सोनिया गांधी की टीम को हाशिये पर भेजने की खुसुर फुसुर तेज हो गई. इस दौरान भी अहमद पटेल हमेशा कूल, शांत नजर आए. हालांकि उनके साथ के बाकी नेता राहुल गांधी के व्यवहार से कुछ असहज थे. मगर अहमद पटेल कभी गांधी परिवार के खिलाफ कुछ भी सुनना पसंद नहीं करते थे.

हालांकि उनके साइड लाइन होने से पार्टी नेताओं और हाई कमान के बीच जो डोर थी वो कमजोर पड़ गई. मगर अहमद पटेल फाइटर होने के साथ-साथ सरवाइवर भी थे. ऐसे में राज्यसभा के अपने चुनाव के दौरान अहमद पटेल ने दर्जनों प्रेस वार्ता की और बीजेपी को मुंह की खानी पड़ी. राज्यसभा में उनकी जीत पार्टी के लिए भी टर्निंग प्वाइंट थी. तब पार्टी धरातल पर थी और नेतागण निराश थे. तब से राहुल गांधी के साथ उनके रिश्ते बदले और राहुल ने भी उनका लोहा माना.

मिलनसारिता थी खासियत 
अहमद पटेल के बारे में यह मशहूर था कि अगर किसी जरूरतमंद ने उनसे मदद मांगी तो वह कभी निराश नहीं हुआ. मुसीबत में अपने दोस्तों को उन्होंने कभी अकेला नहीं छोड़ा. हर ईद पर उनके घर पर लोगों का जमावड़ा लगता. कोरोना काल में भी उनके जन्मदिन पर शुभचिंतको का तांता उनके घर पर लगा था. हालांकि उन्होंने सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए सीटिंग अरेंजमेंट किया था. उनके घर विजिटर्स को पेश की जाने वाली चाय-काफी कस्टमाइज मिलती. चाहे वह कितने व्यस्त हों पर जब वह किसी से मिलते तो कभी एहसास नहीं कराते कि वो कितने अहम और बिजी नेता हैं. अपनी चाटुकारिता और चापलूसी उनको नापसंद थी.

यह रिपोर्टर एक बार जंतर मंतर पर धरना प्रदर्शन के दौरान जब अहमद पटेल का इंटरव्यू कर रही थी तो उसी दौरान किसी ने कोट की जेब से मोबाइल निकाल लिया और भाग गया. एफआईआर लिखवाने के बाद घर पहुंच कर पुराने फोन में सिमकार्ड डाला तो सबसे पहला वायस मैसेज अहमद पटेल का था. उन्होंने कहा, ‘ मेरी वजह से आपका फोन चोरी हो गया…बहुत बुरा हुआ, अब आप कैसे मैनेज करेंगी?’ अहमद पटेल के निधन पर कांग्रेस के ही एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि कांग्रेस पार्टी में वे अपनी किस्म के अकेले नेता थे, उनकी पार्टी में भरपाई होना नामुमकिन है.

 

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