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कोरोना वैक्सीन बना रहीं कंपनियों का ट्रैक रिकॉर्ड कैसा है? यहां जानें

हर किसी की निगाहें वैक्सीन बनाने वाली कंपनियों पर टिकी हैं, जो इतिहास बनाने के कगार पर हैं. इस दौड़ में कई वैक्सीन निर्माता शामिल हैं, जिनमें से कुछ प्रमुख वैक्सीन बनाने वालों का हमने ट्रैक रिकॉर्ड चेक किया है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आश्वासन दिया है कि भारत में कोरोना वैक्सीन कुछ ही हफ्तों में तैयार हो सकती है. अब हर किसी की निगाहें वैक्सीन बनाने वाली कंपनियों पर टिकी हैं, जो इतिहास बनाने के कगार पर हैं. इस दौड़ में कई वैक्सीन निर्माता शामिल हैं, जिनमें से कुछ प्रमुख वैक्सीन बनाने वालों का हमने ट्रैक रिकॉर्ड चेक किया है.

भारत बायोटेक

इसकी स्थापना डॉ कृष्णा एम एला और उनकी पत्नी सुचित्रा एला ने 1996 में एक वैक्सीन और जैव-चिकित्सीय (bio-therapeutics) कंपनी के रूप में की थी. आज इसके पास 140 से ज्यादा पेटेंट हैं. ये कंपनी भारत की अपनी स्वदेशी कोविड-19 वैक्सीन विकसित करने के लिए इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी (NIV) के साथ काम कर रही है. इसका ट्रायल अपने अंतिम चरण में है और 2021 की पहली तिमाही तक नतीजे आने की उम्मीद है.

ट्रैक रिकॉर्ड: भारत बायोटेक के पास 16 से ज्यादा वैक्सीन का पोर्टफोलियो हैं और इसने 116 देशों में 4 अरब से ज्यादा वैक्सीन की डोज सप्लाई की हैं. इनमें पोलियो, रैबीज, रोटावायरस, जापानी इंसेफेलाइटिस, चिकनगुनिया और जीका वायरस की वैक्सीन शामिल हैं. इसने 75 से ज्यादा क्लीनिकल ट्रायल का भी  संचालन किया है.

इसके पास पोलियो, रोटावायरस और टाइफाइड की तीन वैक्सीन हैं जो विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) से अप्रूव्ड हैं. ICMR और NIV के साथ एक संयुक्त साझेदारी के तहत कंपनी ने जापानी इंसेफेलाइटिस की वैक्सीन पर भी काम किया है. इसने 2010 में भारत में पहली H1N1 वैक्सीन लॉन्च की थी.

सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया

उत्पादन के लिहाज से सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (SII) दुनिया की सबसे बड़ी वैक्सीन निर्माता कंपनी है. इसकी स्थापना 1966 में डॉ साइरस एस पूनावाला ने की थी. SII ने निम्न और मध्यम आय वाले देशों के लिए कोरोना वैक्सीन की एक अरब डोज की सप्लाई के लिए ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी और एस्ट्राजेनेका के साथ करार किया है. इस वैक्सीन का क्लीनिकल ट्रायल पूरा हो चुका है और इस महीने के अंत तक यूनाइटेड किंगडम में इसे मंजूरी मिलने की उम्मीद है.

SII द्वारा निर्मित वैक्सीन भारत में पहली कोरोना वैक्सीन में से एक हो सकती है. एस्ट्राजेनेका-ऑक्सफोर्ड वैक्सीन के अलावा, कंपनी ने नोवाक्स के साथ भी कोरोना वैक्सीन बनाने के लिए साझेदारी की है, जो सफल होने पर भारत में उपलब्ध होगी. यह ब्रिटेन के स्पाइवायोटेक और अमेरिका की कोडाजेनिक्स के भी साथ मिलकर कोरोना वैक्सनी विकसित करने पर काम कर रही है.

ट्रैक रिकॉर्ड: दुनिया की सबसे बड़ी वैक्सीन निर्माता कंपनी होने के नाते SII के वैक्सीन पोर्टफोलियो में पोलियो, डिप्थीरिया, टेटनस, पर्टसिस, एचआईबी, बीसीजी, आर-हेपेटाइटिस बी, मीजल्स, मम्प्स और रूबेला की वैक्सीन शामिल हैं. कंपनी का अनुमान है कि दुनिया के करीब 65 फीसदी बच्चों को सीरम इंस्टीट्यूट द्वारा निर्मित कम से कम एक वैक्सीन जरूर लगाई जाती है. डब्ल्यूएचओ से मान्यता प्राप्त इसकी वैक्सीन करीब 170 देशों में पहुंचती है.

इसकी कोरोना वैक्सीन के ट्रायल के दौरान चेन्नई के एक स्वयंसेवक ने दावा किया कि उसे न्यूरोलॉजिकल और मनोवैज्ञानिक साइड इफैक्ट का सामना करना पड़ा और उसने मुआवजे की मांग की. SII ने इस स्वयंसेवक को एक कानूनी नोटिस जारी किया और इस बारे में स्पष्टीकरण दिया कि डेटा और सेफ्टी मॉनिटरिंग बोर्ड और एथिक्स कमेटी ने स्वतंत्र रूप से मंजूरी दे दी है और इस मुद्दे को वैक्सीन ट्रायल से संबंधित नहीं माना है. SII ने ड्रग्स कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया के समक्ष इस घटना से संबंधित सभी रिपोर्ट और डेटा भी पेश किया और आगे के ट्रायल के लिए मंजूरी भी हासिल की.

जाइडस कैडिला

जाइडस कैडिला (Zydus Cadila) अहमदाबाद स्थि‍त कंपनी है जिसकी स्थापना 1952 में हुई थी. कंपनी को स्वदेशी कोरोना वैक्सीन विकसित करने के लिए तीसरे फेज के क्लीनिकल ट्रायल की मंजूरी मिली है. अगर ये ट्रायल सफल हुआ तो इसकी वैक्सीन भारत में विकसित दूसरी वैक्सीन हो सकती है.

ट्रैक रिकॉर्ड: भारत बायोटेक और SII के उलट, Zydus Cadila को वैक्सीन की तुलना में थेरेप्यूटिक्स और इनोवेटिव हेल्थकेयर सॉल्यूशन में ज्यादा सफलता मिली है. हालांकि, Zydus के पास भारत की पहली टेट्रावैलेंट इनएक्टिसवेटेड इन्फ्लुएंजा वैक्सीन है जो चार अलग-अलग इन्फ्लूएंजा वायरस से सुरक्षा प्रदान करती है. कंपनी का कहना है कि इसकी रेबीज वैक्सीन निर्माण सुविधा को भी डब्ल्यूएचओ से मंजूरी मिल चुकी है.

डॉ रेड्डी लैबोरेटरीज

डॉ रेड्डी लैब ने भारत में क्लीनिकल ट्रायल के लिए रशि‍यन डायरेक्ट इनवेस्टमेंट फंड (RDIF) के साथ भागीदारी की है. रूस की स्पुतनिक वी वैक्सीन का वैज्ञानिक बिरादरी ने संदेहपूर्ण दृष्टिस के साथ स्वागत किया क्योंकि इसके शुरुआती ट्रायल डेटा में स्पष्टता की कमी थी.

हालांकि, स्पुतनिक ने रूसी ट्रायल के तीसरे फेज का काफी उत्साहजनक डेटा जारी किया और वैक्सीन के 90% से अधिक प्रभावी (efficacy) का दावा किया. भारत में इस ट्रायल का मूल्यांकन स्वतंत्र रूप से भारतीय नियामकों द्वारा किया जाएगा और अगर ये सफल रहा तो डॉ रेड्डी लैब भारत में स्पुतनिक वी वैक्सीन की 10 करोड़ डोज का वितरण करेगा.

ट्रैक रिकॉर्ड: डॉ रेड्डी ने 1986 में भारत में अपने जेनेरिक व्यवसाय की शुरुआत की और आज इसके 200 से ज्यादा प्रोडक्ट हैं. हालांकि, इसकी मुख्य विशेषज्ञता वैक्सीन की तुलना में थेरेप्यूटिक्स पर ज्यादा केंद्रित है. इसके पोर्टफोलियो में एक्टि व फार्मास्युटिकल इन्ग्रीडेंट्स (APIs), कस्टम फार्मास्युटिकलसर्विसेज, जेनेरिक, बायोसिमिलर्स सहित कई प्रोडक्ट्स और सर्विसेज हैं. कंपनी संयुक्त राज्य अमेरिका, भारत, रूस और यूरोप सहित कई प्रमुख बाजारों में काम करती है.

वैक्सीन के अन्य वैश्विक विकल्प

मॉडर्ना

ये अमेरिका की एक बायोटेक्नोलॉजी कंपनी है, जिसकी स्थापना 10 साल पहले हुई थी. कंपनी ने तब सुर्खियां बटोरीं, जब इसने इस साल की शुरुआत में सबसे पहले कोविड-19 वैक्सीन के लिए क्लीनिकल ट्रायल शुरू किया. मॉडर्ना के मुख्य कार्यकारी अधिकारी स्टीफन बैंसेल के अनुसार, इसके शोधकर्ताओं ने सिर्फ दो दिनों में वैक्सीन का कंप्यूटर मॉडल तैयार कर दिया था. इसकी कोरोना वैक्सीन को पूरी तरह अमेरिकी सरकार फंड कर रही है और कंपनी को उम्मीद है कि इस महीने के अंत तक अमेरिकी रेग्यूलेटर्स से इसकी वैक्सीन को आपातकालीन मंजूरी  मिल जाएगी.

हालांकि, मॉडर्ना की वैक्सीन के सभी रिजर्व डोज का उपयोग अमेरिका में ही होने की उम्मीद है, लेकिन इसने आगे चलकर अपनी वैक्सीन के वैश्विक वितरण के लिए हाल ही में विश्व स्वास्थ्य संगठन के समक्ष आवेदन किया है.

ट्रैक रिकॉर्ड: मॉडर्ना ने अब तक कोई वैक्सीन विकसित नहीं की है. अगर इसकी वैक्सीन को मंजूरी मिलती है तो ये इस कंपनी की पहली वैक्सीन होगी.

फाइजर

इस हफ्ते की शुरुआत में फाइजन पहली फार्मा कंपनी बन गई जिसकी वैक्सीन को रेग्यूलेटर्स की मंजूरी मिल चुकी है. कंपनी ने कहा है कि भारत सहित दुनिया भर के देशों के साथ काम करने के लिए उसके दरवाजे खुले हैं. लेकिन इसकी वैक्सीन का भंडारण और ट्रांसपोर्टशन बेहद मुश्कि‍ल होने के कारण निकट भविष्य में इसके भारत आने की संभावना कम ही है. हालांकि, भारत सरकार के पास अब एक विकल्प ये है कि वह असाधारण परिस्थितियों के लिए मंजूरी हासिल कर चुकी इस वैक्सीन की सीमित मात्रा में खरीद के लिए बातचीत कर सकती है.

ट्रैक रिकॉर्ड: फाइजर अमेरिका की 171 साल पुरानी कंपनी है जिसने इस वैक्सीन के लिए जर्मनी की कंपनी बायोएनटेक के साथ साझेदारी की है. बायोएनटेक की स्थापना 12 साल पहले हुई थी. फाइजर के दस लोकप्रिय प्रोडक्ट ऐसे हैं जो करीब 125 देशों में सप्लाई होते हैं और इससे कंपनी को 1 अरब डॉलर का सालाना राजस्व प्राप्त होता है.

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