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भारत से डर गया ड्रैगनः ‘सफेद आफत’ से घबराए चीन के सैनिक

दुनिया का सबसे ऊंचा युद्ध क्षेत्र माने जाने वाले सियाचीन में भी भारतीय सैनिकों की तैनाती रहती है और ये तैनाती साल 1984 से है. यानि भारतीय सैनिकों को इस तरह के माहौल में रहने की आदत बरसों से है. और यही अनुभव उनके काम आ रहा है.

चीन खुद को बहुत बड़ा तीसमार खां समझ रहा था. लद्दाख में भारतीय सैनिकों को भभकी देने की कोशिश कर रहा था. अब उसी ड्रैगन और उसके सैनिकों की तमाम हेकड़ी निकल गई है. एक सफेद आफत से पीएलए के सैनिक ऐसे घबराए हुए हैं कि अब भारतीय सेना से मुकाबला करने के नाम पर उनकी सिट्टी पिट्टी गुम हो रही है. ये सफेद आफत ऐसी है, जिससे हमारे सैनिक वर्षों से खेलते आ रहे हैं. अब आलम ये है कि ड्रैगन बातचीत की टेबल पर भी आने को तैयार हो गया है.

पूर्वी लद्दाख में एलएसी पर जारी गतिरोध के बीच भारत और चीन दोनों के ही हजारों सैनिक हांड़कंपाऊ ठंड के बावजूद तैनात है. हालांकि, ऐसा लगता है कि कड़ाके की ठंड और बर्फबारी में चीनी सैनिकों के हौसले पस्त होने लगे हैं. फॉरवर्ड पोजिशनों पर उसके सैनिक हर रोज बदले जा रहे हैं जबकि भारत की तरफ से उन्हीं लोकेशंस पर सैनिक काफी लंबे वक्त तक टिक रहे हैं. उसकी वजह ये भी है कि भारतीय सैनिक पहले भी इन पोजिशन पर तैनात रहे हैं और वो इस मौसम से अच्छी तरह से वाकिफ हैं. जबकि चीनी सैनिक इस तरह के मौसम में रहने के आदी नहीं है. लिहाजा उन्हें ऐसी पोस्टों पर वक्त बिताने में काफी कठनाई का सामना करना पड़ा रहा है.

दुनिया का सबसे ऊंचा युद्ध क्षेत्र माने जाने वाले सियाचीन में भी भारतीय सैनिकों की तैनाती रहती है और ये तैनाती साल 1984 से है. यानि भारतीय सैनिकों को इस तरह के माहौल में रहने की आदत बरसों से है. और यही अनुभव उनके काम आ रहा है. भारतीय सेना की कई कोर ऐसी हैं, जिन्हें ऐसे विषम मौसम में रहने की न केवल ट्रेनिंग दी जाती है. बल्कि ऐसी परस्थितियों में रहकर जंग को कैसे जीता जाए, इसका भी जज्बा उनके अंदर पूरी तरह से भरा जाता है.

सूत्रों के मुताबिक अभी तो ठंड की शुरुआत होनी शुरू हुई है. और अभी से चीनी सैनिकों की हालत पतली होने लगी है. आने वाले वक्त में पारा -50 से -70 डिग्री तक जा सकता है. उस मौसम में चीनी सैनिकों की हालत खराब होने वाली है. उसकी एक वजह ये भी है कि अगर हालात खराब होते हैं तो भारतीय सैनिकों को ऊंची पहाड़ियों पर लड़ने की आदत है. जबकि चीनी सैनिकों को इस तरह का कोई अनुभव नहीं है.

एलएसी के फॉरवर्ड पोस्ट्स पर तैनात हमारे जवान चीनी सैनिकों की तुलना में काफी समय तक तैनात रहे हैं. कड़ाके की ठंड और ऐसे तापमान में कभी नहीं रहने की वजह से चीनियों को अपने जवानों को डेली बेसिस पर रोटेट करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है. मौसम का सामना करने के लिहाज से भारतीय जवानों को चीनियों पर स्पष्ट बढ़त हासिल है क्योंकि बड़ी तादाद में हमारे जवान लद्दाख और सियाचिन में पहले ही ड्यूटी कर चुके हैं.

सियाचिन तो दुनिया का सबसे ऊंचाई वाला क्षेत्र है जहां सैनिक तैनात होते हैं. चालबाज चीन ने इस साल अप्रैल-मई में एलएसी पर आक्रामकता दिखाते हुए करीब 60 हजार जवानों को पूर्वी लद्दाख सेक्टर में तैनात कर दिया. टैंक और भारी हथियारों से लैस इन सैनिकों ने भारतीय क्षेत्र में अतिक्रमण कर लिया और वहां पोजिशंस ले ली.

जवाब में भारत ने भी तकरीबन उतने ही सैनिकों को तैनात कर दिया ताकि चीनियों को आगे किसी भी तरह की हिमाकत से रोका जा सके. गिरते तापमान का असर न केवल चीनी सैनिकों पर पड़ेगा बल्कि उन हथियारों पर भी पड़ेगा जिन्हें वहां पर तैनात किया गया है. बदलते मौसम के साथ इन हथियारों की क्षमता भी बदलती है. यानि कि वक्त पड़ने पर चीनी सेना ने एलएसी पर जो हथियार तैनात  किए हैं, वो टांय-टांय फिस्स भी हो सकते हैं.

इस बीच तनाव कम करने और गतिरोध खत्म करने के लिए दोनों ही पक्षों के बीच बातचीत का सिलसिला जारी है. दोनों देशों के बीच अब तक कोर कमांडर लेवल की 7 राउंड की सैन्य वार्ता हो चुकी है. 15 जून को पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच खूनी झड़प हुई थी, जिसमें चीनी सैनिकों के साथ-साथ हमारे 20 जवान शहीद हुए थे. भारत चाहता है कि पैंगोंग झील के दक्षिणी किनारे पर उसके सैनिकों के पीछे हटने से पहले चीनी सैनिक फिंगर एरिया में पीछे जाएं. अगर ये गतिरोध नहीं टूटता तो दोनों देश के सैनिकों को दुनिया की ऐसी जगह पर वक्त बिताना पड़ेगा, जहां पर कोई भी नहीं रहना चाहता है.

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